16 जून, 1951 ई0 को इण्डोलॉजी एवं संस्कृत शिक्षा के क्षेत्र में अन्तर्राष्टीय स्तर की ख्याति प्राप्त करने हेतु दरभंगा के तत्कालीन महाराजाधिराज डा० सर कामेश्वर सिंह के संस्कृत विद्या के प्रति अगाध प्रेम तथा समर्पण के फलस्वरूप महान् शिक्षाविद् आचार्य बदरीनाथ वर्मा एवं तत्कालीन शिक्षा सचिव माननीय जे०सी०माथुर के सौजन्य से मिथिला संस्कृत स्नातकोत्तर अध्ययन एवं शोध संस्थान की स्थापना प्राच्य विद्या एवं संस्कृत विद्या की सभी शाखाओं के उन्नयन एवं आधुनिकतम तकनीक पर संस्कृत विद्या के उच्चस्तरीय अध्ययन-अध्यापन, अनुसंधान एवं प्रकाशन के उद्दश्यों के लिये की गई।
मिथिलांचल की हृदयस्थली तथा सांस्कृतिक नगरी दरभंगा में तत्कालीन महाराजाधिराज डा० सर कामेश्वर सिंह ने अपनी उदार दानशीलता का परिचय देते हुए 62 बीघे का विशाल भू-खण्ड तथा भवन निर्माणादि के लिये राज्य सरकार को मो0-3,50,000/- रूपये दान स्वरूप प्रदान किया। इस भू-खण्ड पर स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति देशरत्न डॉ० राजेन्द्र प्रसाद जी के कर कमलों से 21 नवम्बर, 1951 ई० को मुख्य प्रशासनिक भवन का शिलान्यास किया गया ।
